EN اردو
मोहसिन नक़वी शायरी | शाही शायरी

मोहसिन नक़वी शेर

28 शेर

सिर्फ़ हाथों को न देखो कभी आँखें भी पढ़ो
कुछ सवाली बड़े ख़ुद्दार हुआ करते हैं

मोहसिन नक़वी




शाख़-ए-उरियाँ पर खिला इक फूल इस अंदाज़ से
जिस तरह ताज़ा लहू चमके नई तलवार पर

मोहसिन नक़वी




पलट के आ गई ख़ेमे की सम्त प्यास मिरी
फटे हुए थे सभी बादलों के मश्कीज़े

मोहसिन नक़वी




मौसम-ए-ज़र्द में एक दिल को बचाऊँ कैसे
ऐसी रुत में तो घने पेड़ भी झड़ जाते हैं

मोहसिन नक़वी




लोगो भला इस शहर में कैसे जिएँगे हम जहाँ
हो जुर्म तन्हा सोचना लेकिन सज़ा आवारगी

मोहसिन नक़वी




अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था

मोहसिन नक़वी




कितने लहजों के ग़िलाफ़ों में छुपाऊँ तुझ को
शहर वाले मिरा मौज़ू-ए-सुख़न जानते हैं

मोहसिन नक़वी




कल थके-हारे परिंदों ने नसीहत की मुझे
शाम ढल जाए तो 'मोहसिन' तुम भी घर जाया करो

मोहसिन नक़वी




कहाँ मिलेगी मिसाल मेरी सितमगरी की
कि मैं गुलाबों के ज़ख़्म काँटों से सी रहा हूँ

मोहसिन नक़वी