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मीर मेहदी मजरूह शायरी | शाही शायरी

मीर मेहदी मजरूह शेर

38 शेर

तरश्शोह हाँ करे जिस की नहीं पर
मिरी सौ जाँ तसद्दुक़ उस नहीं पर

मीर मेहदी मजरूह




सुना हाल-ए-दिल-ए-'मजरूह' शब को
कोई हसरत सी हसरत थी बयाँ में

मीर मेहदी मजरूह




शौक़ से शौक़ है कुछ मंज़िल का
राहबर से भी बढ़े जाते हैं

मीर मेहदी मजरूह




शग़्ल-ए-उल्फ़त को जो अहबाब बुरा कहते हैं
कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या कहते हैं

मीर मेहदी मजरूह




सहल हो गरचे अदू को मगर उस का मिलना
इतना मैं ख़ूब समझता हूँ कि आसाँ तो नहीं

मीर मेहदी मजरूह




राल टपकेगी शैख़-साहिब की
न दिखाओ शराब की सूरत

मीर मेहदी मजरूह




नए फ़ित्ने जो उठते हैं जहाँ में
सलाहें सब ये लेते हैं तुम्हीं से

मीर मेहदी मजरूह




न उस के लब को फ़क़त लाल कह के ख़त्म करो
अभी तो उस में बहुत सी है गुफ़्तुगू बाक़ी

मीर मेहदी मजरूह




न तो सय्याद का खटका न ख़िज़ाँ का धड़का
हम को वो चैन क़फ़स में है कि बुस्ताँ में नहीं

मीर मेहदी मजरूह