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मंज़ूर हाशमी शायरी | शाही शायरी

मंज़ूर हाशमी शेर

27 शेर

पानी में ज़रा देर को हलचल तो हुई थी
फिर यूँ था कि जैसे कोई डूबा ही नहीं था

मंज़ूर हाशमी




नई फ़ज़ा के परिंदे हैं कितने मतवाले
कि बाल-ओ-पर से भी पहले उड़ान माँगते हैं

मंज़ूर हाशमी




न जाने उस की कहानी में कितने पहलू हैं
कि जब सुनो तो नया वाक़िआ निकलता है

मंज़ूर हाशमी




मोम के पुतले थे हम और गर्म हाथों में रहे
जिस ने जो चाहा हमें वैसा बना कर ले गया

मंज़ूर हाशमी




मैं उस के बारे में इतना ज़ियादा सोचता हूँ
कि एक रोज़ उसे रू-ब-रू तो होना है

मंज़ूर हाशमी




चलो लहू भी चराग़ों की नज़्र कर देंगे
ये शर्त है कि वो फिर रौशनी ज़ियादा करें

मंज़ूर हाशमी




कुछ अब के धूप का ऐसा मिज़ाज बिगड़ा है
दरख़्त भी तो यहाँ साएबान माँगते हैं

मंज़ूर हाशमी




कोई मकीं था न मेहमान आने वाला था
तो फिर किवाड़ खुला किस के इंतिज़ार में था

मंज़ूर हाशमी




कभी कभी तो किसी अजनबी के मिलने पर
बहुत पुराना कोई सिलसिला निकलता है

मंज़ूर हाशमी