मर्ग-ए-आशिक़ पे फ़रिश्ता मौत का बदनाम था
वो हँसी रोके हुए बैठा था जिस का काम था
मंज़र लखनवी
मुझे मिटा के वो यूँ बैठे मुस्कुराते हैं
किसी से जैसे कोई नेक काम हो जाए
मंज़र लखनवी
मुद्दतों बा'द कभी ऐ नज़र आने वाले
ईद का चाँद न देखा तिरी सूरत देखी
मंज़र लखनवी
मोहब्बत तो हम ने भी की और बहुत की
मगर हुस्न को इश्क़ करना न आया
मंज़र लखनवी
मिटाने वाले हमारा ही घर मिटाना था
चमन में एक से एक अच्छा आशियाना था
मंज़र लखनवी
मिरी रात क्यूँकर कटेगी इलाही
मुझे दिन को तारे नज़र आ रहे हैं
मंज़र लखनवी
मिरी रात क्यूँ कर कटेगी इलाही
मुझे दिन को तारे नज़र आ रहे हैं
मंज़र लखनवी
मिरा बेड़ी पहनना था कि दुनिया की हवा बदली
ज़माने की बहारें फट पड़ीं आ के गुलिस्ताँ पर
मंज़र लखनवी
कीजिए क्यूँ मुर्दा अरमानों से छेड़
सोने वालों को तो सोने दीजिए
मंज़र लखनवी

