न जाने किस की हमें उम्र भर तलाश रही
जिसे क़रीब से देखा वो दूसरा निकला
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
तेरे न हो सके तो किसी के न हो सके
ये कारोबार-ए-शौक़ मुकर्रर न हो सका
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
तमाम यादें महक रही हैं हर एक ग़ुंचा खिला हुआ है
ज़माना बीता मगर गुमाँ है कि आज ही वो जुदा हुआ है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
सुना रहा हूँ उन्हें झूट-मूट इक क़िस्सा
कि एक शख़्स मोहब्बत में कामयाब रहा
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
निकाले गए इस के मअ'नी हज़ार
अजब चीज़ थी इक मिरी ख़ामुशी
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
निगाह-ए-मेहरबाँ उठती तो है सब की तरफ़ लेकिन
नहीं वाक़िफ़ अभी सब लोग रम्ज़-ए-आश्नाई से
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नहीं अब कोई ख़्वाब ऐसा तिरी सूरत जो दिखलाए
बिछड़ कर तुझ से किस मंज़िल पर हम तन्हा चले आए
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मैं कहाँ हूँ कुछ बता दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
फिर सदा अपनी सुना दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मेरे दुश्मन न मुझ को भूल सके
वर्ना रखता है कौन किस को याद
ख़लील-उर-रहमान आज़मी

