माशूक़ों से उम्मीद-ए-वफ़ा रखते हो 'नासिख़'
नादाँ कोई दुनिया में नहीं तुम से ज़ियादा
इमाम बख़्श नासिख़
शुबह 'नासिख़' नहीं कुछ 'मीर' की उस्तादी में
आप बे-बहरा है जो मो'तक़िद-ए-'मीर' नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं
जिस सर-ज़मीं के हम हैं वहाँ आसमाँ नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
रश्क से नाम नहीं लेते कि सुन ले न कोई
दिल ही दिल में उसे हम याद किया करते हैं
इमाम बख़्श नासिख़
रात दिन नाक़ूस कहते हैं ब-आवाज़-ए-बुलंद
दैर से बेहतर है काबा गर बुतों में तू नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
मुँह आप को दिखा नहीं सकता है शर्म से
इस वास्ते है पीठ इधर आफ़्ताब की
इमाम बख़्श नासिख़
क्या रोज़-ए-बद में साथ रहे कोई हम-नशीं
पत्ते भी भागते हैं ख़िज़ाँ में शजर से दूर
इमाम बख़्श नासिख़
ख़्वाब ही में नज़र आ जाए शब-ए-हिज्र कहीं
सो मुझे हसरत-ए-दीदार ने सोने न दिया
her, on the eve of separation, in dreams I'd hoped to sight
but the yearning for her vision kept me up all night
इमाम बख़्श नासिख़
किस तरह छोड़ूँ यकायक तेरी ज़ुल्फ़ों का ख़याल
एक मुद्दत के ये काले नाग हैं पाले हुए
इमाम बख़्श नासिख़

