उसी का ईमाँ बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था
गुलज़ार
रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे
धूप उन्डेलो थोड़ी सी पैमाने में
गुलज़ार
राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद
गुलज़ार
फिर वहीं लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रिहाई दी है
गुलज़ार
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है
गुलज़ार
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
गुलज़ार
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
गुलज़ार
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में
गुलज़ार
ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी
गुलज़ार

