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असग़र गोंडवी शायरी | शाही शायरी

असग़र गोंडवी शेर

54 शेर

नहीं दैर ओ हरम से काम हम उल्फ़त के बंदे हैं
वही काबा है अपना आरज़ू दिल की जहाँ निकले

असग़र गोंडवी




सौ बार तिरा दामन हाथों में मिरे आया
जब आँख खुली देखा अपना ही गरेबाँ है

असग़र गोंडवी




रूदाद-ए-चमन सुनता हूँ इस तरह क़फ़स में
जैसे कभी आँखों से गुलिस्ताँ नहीं देखा

असग़र गोंडवी




रिंद जो ज़र्फ़ उठा लें वही साग़र बन जाए
जिस जगह बैठ के पी लें वही मय-ख़ाना बने

असग़र गोंडवी




क़हर है थोड़ी सी भी ग़फ़लत तरीक़-ए-इश्क़ में
आँख झपकी क़ैस की और सामने महमिल न था

असग़र गोंडवी




पहली नज़र भी आप की उफ़ किस बला की थी
हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए

असग़र गोंडवी




नियाज़-ए-इश्क़ को समझा है क्या ऐ वाइज़-ए-नादाँ
हज़ारों बन गए काबे जबीं मैं ने जहाँ रख दी

o foolish priest the offering of love you do not know
a thousand mosques did appear wherever I did bow

असग़र गोंडवी




मैं क्या कहूँ कहाँ है मोहब्बत कहाँ नहीं
रग रग में दौड़ी फिरती है नश्तर लिए हुए

असग़र गोंडवी




मिरी वहशत पे बहस-आराइयाँ अच्छी नहीं ज़ाहिद
बहुत से बाँध रक्खे हैं गरेबाँ मैं ने दामन में

असग़र गोंडवी