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अकबर हैदराबादी शायरी | शाही शायरी

अकबर हैदराबादी शेर

21 शेर

पहुँच के जो सर-ए-मंज़िल बिछड़ गया मुझ से
वो हम-सफ़र था मगर हम-नज़र न था मेरा

अकबर हैदराबादी




मिरी शिकस्त भी थी मेरी ज़ात से मंसूब
कि मेरी फ़िक्र का हर फ़ैसला शुऊरी था

अकबर हैदराबादी




मुबहम थे सब नुक़ूश नक़ाबों की धुँद में
चेहरा इक और भी पस-ए-चेहरा ज़रूर था

अकबर हैदराबादी




मुसाफ़िरत का वलवला सियाहतों का मश्ग़ला
जो तुम में कुछ ज़ियादा है सफ़र करो सफ़र करो

अकबर हैदराबादी




मुश्किल ही से कर लेती है दुनिया उसे क़ुबूल
ऐसी हक़ीक़त जिस में फ़साना कम कम होता है

अकबर हैदराबादी




न जाने कितनी बस्तियाँ उजड़ के रह गईं
मिले हैं रास्ते में कुछ मकाँ जले जले

अकबर हैदराबादी




रुत बदली तो ज़मीं के चेहरे का ग़ाज़ा भी बदला
रंग मगर ख़ुद आसमान ने बदले कैसे कैसे

अकबर हैदराबादी




यही सोच कर इक्तिफ़ा चार पर कर गए शैख़-जी
मिलेंगी वहाँ उन को हूर और परियाँ वग़ैरा वग़ैरा

अकबर हैदराबादी




वो पास हो के दूर है तो दूर हो के पास
फ़िराक़ और विसाल हैं अजीब अजीब से

अकबर हैदराबादी