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अहमद ख़याल शायरी | शाही शायरी

अहमद ख़याल शेर

19 शेर

मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद'
और सदियों का सफ़र था मुझ में

अहमद ख़याल




ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या
जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना

अहमद ख़याल




ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था

अहमद ख़याल




वो ज़हर है फ़ज़ाओं में कि आदमी की बात क्या
हवा का साँस लेना भी मुहाल कर दिया गया

अहमद ख़याल




वो सर उठाए यहाँ से पलट गया 'अहमद'
मैं सर झुकाए खड़ा हूँ सवाल ऐसा था

अहमद ख़याल




वो दे रहा था तलब से सिवा सभी को 'ख़याल'
सो मैं ने दामन-ए-दिल और कुछ कुशादा किया

अहमद ख़याल




तू जो ये जान हथेली पे लिए फिरता है
तेरा किरदार कहानी से निकल सकता है

अहमद ख़याल




तुम्हारी जीत में पिन्हाँ है मेरी जीत कहीं
तुम्हारे सामने हर बार हारता हुआ मैं

अहमद ख़याल




सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए
कभी-कभार ख़ुद से भी कलाम करना चाहिए

अहमद ख़याल