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जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया | शाही शायरी
junun ko raKHt kiya KHak ko libaada kiya

ग़ज़ल

जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया

अहमद ख़याल

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जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया
मैं दश्त दश्त भटकने का जब इरादा किया

मैं नासेहान की सुनता हूँ और टालता हूँ
सो क़ुर्ब-ए-हुस्न छुटा और न तर्क-ए-बादा किया

महकते फूल सितारे दमकता चाँद धनक
तिरे जमाल से कितनों ने इस्तिफ़ादा क्या

हज़ार रंग में जल्वा-नुमा था हुस्न-ओ-जमाल
दिल और शोख़ हुआ उस को जितना सादा किया

वो दे रहा था तलब से सिवा सभी को 'ख़याल'
सो मैं ने दामन-ए-दिल और कुछ कुशादा किया