ख़ज़ीने जाँ के लुटाने वाले दिलों में बसने की आस ले कर
सुना है कुछ लोग ऐसे गुज़रे जो घर से आए न घर गए हैं
अदा जाफ़री
लोग बे-मेहर न होते होंगे
वहम सा दिल को हुआ था शायद
अदा जाफ़री
कुछ इतनी रौशनी में थे चेहरों के आइने
दिल उस को ढूँढता था जिसे जानता न था
अदा जाफ़री
कोई ताइर इधर नहीं आता
कैसी तक़्सीर इस मकाँ से हुई
अदा जाफ़री
कोई बात ख़्वाब-ओ-ख़याल की जो करो तो वक़्त कटेगा अब
हमें मौसमों के मिज़ाज पर कोई ए'तिबार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
किन मंज़िलों लुटे हैं मोहब्बत के क़ाफ़िले
इंसाँ ज़मीं पे आज ग़रीब-उल-वतन सा है
अदा जाफ़री
ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई
इब्तिदा रंज की कहाँ से हुई
अदा जाफ़री
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या
अदा जाफ़री
कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला
सूरज मिरी निगाह की सच्चाइयों में था
अदा जाफ़री

