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इश्क शायरी | शाही शायरी

इश्क

422 शेर

'फ़राज़' इश्क़ की दुनिया तो ख़ूब-सूरत थी
ये किस ने फ़ित्ना-ए-हिज्र-ओ-विसाल रक्खा है

अहमद फ़राज़




हम तिरे शौक़ में यूँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं
जैसे बच्चे किसी त्यौहार में गुम हो जाएँ

अहमद फ़राज़




किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

अहमद फ़राज़




रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

अहमद फ़राज़




तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त
तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त

अहमद फ़राज़




ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
कि तेरा देखना देखा न जाए

अहमद फ़राज़




मोहब्बत ने 'माइल' किया हर किसी को
किसी पर किसी को किसी पर किसी को

अहमद हुसैन माइल