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एडीए शायरी | शाही शायरी

एडीए

25 शेर

बे-ख़ुद भी हैं होशियार भी हैं देखने वाले
इन मस्त निगाहों की अदा और ही कुछ है

अबुल कलाम आज़ाद




पामाल कर के पूछते हैं किस अदा से वो
इस दिल में आग थी मिरे तलवे झुलस गए

आग़ा शाएर क़ज़लबाश




पहले इस में इक अदा थी नाज़ था अंदाज़ था
रूठना अब तो तिरी आदत में शामिल हो गया

आग़ा शाएर क़ज़लबाश




हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

how easy is for these maidens to make the lightening fall

अकबर इलाहाबादी


टैग: | एडीए | | हया |


लगावट की अदा से उन का कहना पान हाज़िर है
क़यामत है सितम है दिल फ़िदा है जान हाज़िर है

अकबर इलाहाबादी




आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन
मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है

अमीर मीनाई




अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का
बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़