ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो
राहत इंदौरी
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो
राहत इंदौरी
आप ने अच्छा किया ततहीर-ए-ख़्वाहिश ही न की
वर्ना ज़मज़म चश्मा-ए-नापाक होता ग़ालिबन
राही फ़िदाई
बराए-नाम ही सही ब-एहतियात कीजिए
दरून-ए-किज़्ब-ओ-इफ़्तिरा सदाक़तें ख़लत-मलत
राही फ़िदाई
हादसों के ख़ौफ़ से एहसास की हद में न था
वर्ना नफ़्स-ए-मुतमइन सफ़्फ़ाक होता ग़ालिबन
राही फ़िदाई
हर एक शाख़ थी लर्ज़ां फ़ज़ा में चीख़-ओ-पुकार
हवा के हाथ में इक आब-दार ख़ंजर था
राही फ़िदाई
हवस-गिरफ़्ता हवाओ निगाहें नीची रखो
शजर खड़े हैं सड़क के क़रीन बे-पर्दा
राही फ़िदाई

