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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

वही है ज़िंदगी लेकिन 'जिगर' ये हाल है अपना
कि जैसे ज़िंदगी से ज़िंदगी कम होती जाती है

जिगर मुरादाबादी




वो चीज़ कहते हैं फ़िरदौस-ए-गुमशुदा जिस को
कभी कभी तिरी आँखों में पाई जाती है

जिगर मुरादाबादी




वो हज़ार दुश्मन-ए-जाँ सही मुझे फिर भी ग़ैर अज़ीज़ है
जिसे ख़ाक-ए-पा तिरी छू गई वो बुरा भी हो तो बुरा नहीं

जिगर मुरादाबादी




वो ख़लिश जिस से था हंगामा-ए-हस्ती बरपा
वक़्फ़-ए-बेताबी-ए-ख़ामोश हुई जाती है

जिगर मुरादाबादी




वो थे न मुझ से दूर न मैं उन से दूर था
आता न था नज़र तो नज़र का क़ुसूर था

जिगर मुरादाबादी




या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है

जिगर मुरादाबादी




ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी