इश्क़ बिन जीने के आदाब नहीं आते हैं
'मीर' साहब ने कहा है कि मियाँ इश्क़ करो
वाली आसी
ज़माना और अभी ठोकरें लगाए हमें
अभी कुछ और सँवर जाना चाहते हैं हम
वाली आसी
वहाँ हमारा कोई मुंतज़िर नहीं फिर भी
हमें न रोक कि घर जाना चाहते हैं हम
वाली आसी
उन्हें भी जीने के कुछ तजरबे हुए होंगे
जो कह रहे हैं कि मर जाना चाहते हैं हम
वाली आसी
सब बिछड़े साथी मिल जाएँ मुरझाएँ चेहरे खिल जाएँ
सब चाक दिलों के सिल जाएँ कोई ऐसा काम करो 'वाली'
वाली आसी
मुसल्ला रखते हैं सहबा-ओ-जाम रखते हैं
फ़क़ीर सब के लिए इंतिज़ाम रखते हैं
वाली आसी
मौज-ए-हवा आब-ए-रवाँ और ये ज़मीन ओ आसमाँ
इक रोज़ सब जाएँगे थक अल्लाह बस बाक़ी हवस
वाली आसी
मैं जिस का जवाब न दे पाऊँ
ऐसा भी कोई सवाल करना
वाली आसी
कभी भूले से भी अब याद भी आती नहीं जिन की
वही क़िस्से ज़माने को सुनाना चाहते हैं हम
वाली आसी

