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ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ शायरी | शाही शायरी

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ शेर

22 शेर

तबाहियों का तो दिल की गिला नहीं लेकिन
किसी ग़रीब का ये आख़िरी सहारा था

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




मंज़िलें राह में थीं नक़्श-ए-क़दम की सूरत
हम ने मुड़ कर भी न देखा किसी मंज़िल की तरफ़

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




मेरे अफ़्कार की रानाइयाँ तेरे दम से
मेरी आवाज़ में शामिल तिरी आवाज़ भी है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़
गुलों ने और भी शबनम से ताज़गी पाई

your cheeks with perspiration are all aglow anew
these flowers are now fresher laden with the dew

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




रह-ए-तलब में किसे आरज़ू-ए-मंज़िल है
शुऊर हो तो सफ़र ख़ुद सफ़र का हासिल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है
ये आज़माइश-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




यादों के साए हैं न उमीदों के हैं चराग़
हर शय ने साथ छोड़ दिया है तिरी तरह

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




ये मय-कदा है कलीसा ओ ख़ानक़ाह नहीं
उरूज-ए-फ़िक्र ओ फ़रोग़-ए-नज़र की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ




ये चार दिन की रिफ़ाक़त भी कम नहीं ऐ दोस्त
तमाम उम्र भला कौन साथ देता है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ