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सलीम कौसर शायरी | शाही शायरी

सलीम कौसर शेर

48 शेर

पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे
जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए

सलीम कौसर




साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला
जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में

सलीम कौसर




साए गली में जागते रहते हैं रात भर
तन्हाइयों की ओट से झाँका न कर मुझे

सलीम कौसर




रात को रात ही इस बार कहा है हम ने
हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की

सलीम कौसर




क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं

सलीम कौसर




क़दमों में साए की तरह रौंदे गए हैं हम
हम से ज़ियादा तेरा तलबगार कौन है

सलीम कौसर




मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

tho my sight unconversant with your features may not be
if or not you are the same come close and let me see,

सलीम कौसर




मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

I am in someone's outstretched hand, and in someone's prayer prayer I be
I am someone's destiny but someone else does ask for me

सलीम कौसर




मैं ने जो लिख दिया वो ख़ुद है गवाही अपनी
जो नहीं लिक्खा अभी उस की बशारत दूँगा

सलीम कौसर