क्या इसी को बहार कहते हैं
लाला-ओ-गुल से ख़ूँ टपकता है
सलाम संदेलवी
ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी
फिर इस के ब'अद न आया बहार का मौसम
सलाम संदेलवी
आए जो चंद तिनके क़फ़स में सबा के साथ
मैं ने उन्हीं को अपना नशेमन समझ लिया
सलाम संदेलवी
हुई सुब्ह जाम खनक उठे हुई शाम नग़्मे बिखर गए
वो हसीन दिन भी थे किस क़दर जो तुम्हारे साथ गुज़र गए
सलाम संदेलवी
हमेशा दूर के जल्वे फ़रेब देते हैं
है वर्ना चाँद बयाबाँ किसी को क्या मालूम
सलाम संदेलवी
है तिश्ना-लबी लेकिन हम क्यूँ उसे ज़हमत दें
अपना ही लहू पी लें साक़ी को जगाएँ क्या
सलाम संदेलवी
गुल-ओ-ग़ुंचा अस्ल में हैं तिरी गुफ़्तुगू की शक्लें
कभी खुल के बात कह दी कभी कर दिया इशारा
सलाम संदेलवी
गुलों के रूप में बिखरे हैं हर तरफ़ काँटे
चले जो कोई तो दामन ज़रा बचा के चले
सलाम संदेलवी
दिल की धड़कन भी है उन को नागवार
उन से कुछ कहने की जुरअत क्या करें
सलाम संदेलवी

