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सबा अकबराबादी शायरी | शाही शायरी

सबा अकबराबादी शेर

35 शेर

कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा
कब तक मकाँ का हाल कहेंगे मकीं से हम

सबा अकबराबादी




कुफ़्र ओ इस्लाम के झगड़े को चुका दो साहब
जंग आपस में करें शैख़ ओ बरहमन कब तक

सबा अकबराबादी




ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया
इक नज़र ने आइने में अक्स गहरा कर दिया

सबा अकबराबादी




कौन उठाए इश्क़ के अंजाम की जानिब नज़र
कुछ असर बाक़ी हैं अब तक हैरत-ए-आग़ाज़ के

सबा अकबराबादी




कमाल-ए-ज़ब्त में यूँ अश्क-ए-मुज़्तर टूट कर निकला
असीर-ए-ग़म कोई ज़िंदाँ से जैसे छूट कर निकला

सबा अकबराबादी




काम आएगी मिज़ाज-ए-इश्क़ की आशुफ़्तगी
और कुछ हो या न हो हंगामा-ए-महफ़िल सही

सबा अकबराबादी




जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में
कोई चराग़ नूर-बदामाँ नहीं है अब

सबा अकबराबादी




क्या मआल-ए-दहर है मेरी मोहब्बत का मआल
हैं अभी लाखों फ़साने मुंतज़िर आग़ाज़ के

सबा अकबराबादी




कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम
उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम

सबा अकबराबादी