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राजेन्द्र मनचंदा बानी शायरी | शाही शायरी

राजेन्द्र मनचंदा बानी शेर

31 शेर

उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला
सुब्ह का पहला परिंदा आसमाँ भर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी




मिरे वास्ते जाने क्या लाएगी
गई है हवा इक खंडर की तरफ़

राजेन्द्र मनचंदा बानी




मोहब्बतें न रहीं उस के दिल में मेरे लिए
मगर वो मिलता था हँस कर कि वज़्अ-दार जो था

राजेन्द्र मनचंदा बानी




ओस से प्यास कहाँ बुझती है
मूसला-धार बरस मेरी जान

राजेन्द्र मनचंदा बानी




पैहम मौज-ए-इमकानी में
अगला पाँव नए पानी में

राजेन्द्र मनचंदा बानी




फैलती जाएगी चारों सम्त इक ख़ुश-रौनक़ी
एक मौसम मेरे अंदर से निकलता जाएगा

राजेन्द्र मनचंदा बानी




शामिल हूँ क़ाफ़िले में मगर सर में धुँद है
शायद है कोई राह जुदा भी मिरे लिए

राजेन्द्र मनचंदा बानी




थी पाँव में कोई ज़ंजीर बच गए वर्ना
रम-ए-हवा का तमाशा यहाँ रहा है बहुत

राजेन्द्र मनचंदा बानी




वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था
कि चुप सी लग गई दोनों को बात करते हुए

राजेन्द्र मनचंदा बानी