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मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल शायरी | शाही शायरी

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल शेर

32 शेर

सताना क़त्ल करना फिर जलाना
वो बे-तालीम क्या क्या जानते हैं

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




परवाने के हुज़ूर जलाया न शम्अ' को
बुलबुल के आगे फूल न तोड़ा गुलाब का

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




निकला न दाग़-ए-दिल से हमारा तो कोई काम
न वो चराग़-ए-दैर न शम-ए-हरम हुआ

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




मर्तबा माशूक़ का आशिक़ से बाला-दस्त है
ख़ार की जा ज़ेर-ए-पा गुल का मकाँ दस्तार पर

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




लुत्फ़ तब अमर्द-परस्ती का है बाग़-ए-ख़ुल्द में
पास बैठे जबकि ग़िल्माँ और खड़ी हो हूर दूर

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




लैलतुल-क़द्र है हर शब उसे हर रोज़ है ईद
जिस ने मय-ख़ाने में माह-ए-रमज़ाँ देखा है

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




क्या ख़बर है हम से महजूरों की उन को रोज़-ए-ईद
जो गले मिल कर बहम सर्फ़-ए-मुबारकबाद हैं

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




आ के सज्जादा-नशीं क़ैस हुआ मेरे ब'अद
न रही दश्त में ख़ाली मिरी जा मेरे ब'अद

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल




ख़त-नवेसी ये है तो मुश्ताक़ो
हाथ इक दिन क़लम तुम्हारे हैं

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल