EN اردو
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ शायरी | शाही शायरी

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ शेर

22 शेर

किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता
हम जा नहीं सकते उन्हें आना नहीं मिलता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




हम तो अपनों से भी बेगाना हुए उल्फ़त में
तुम जो ग़ैरों से मिले तुम को न ग़ैरत आई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को
यही हुनर है कि कोई हुनर नहीं आता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




इतना तो जज़्ब-ए-इश्क़ ने बारे असर किया
उस को भी अब मलाल है मेरे मलाल का

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




जोश-ए-वहशत यही कहता है निहायत कम है
दो जहाँ से भी अगर वुसअत-ए-सहरा बढ़ जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




ख़ुद-फ़रोशी को जो तू निकले ब-शक्ल-ए-यूसुफ़
ऐ सनम तेरी ख़रीदार ख़ुदाई हो जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




नहीं बुतों के तसव्वुर से कोई दिल ख़ाली
ख़ुदा ने उन को दिए हैं मकान सीनों में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




उर्यां हरारत-ए-तप-ए-फ़ुर्क़त से मैं रहा
हर बार मेरे जिस्म की पोशाक जल गई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़




पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल
बे-इख़्तियार आह लबों से निकल गई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़