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मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस शायरी | शाही शायरी

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस शेर

19 शेर

न काफ़िर से ख़ल्वत न ज़ाहिद से उल्फ़त
हम इक बज़्म में थे ये सब से जुदा थे

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




ज़ाहिद का दिल न ख़ातिर-ए-मय-ख़्वार तोड़िए
सौ बार तो ये कीजिए सौ बार तोड़िए

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




या ख़फ़ा होते थे हम तो मिन्नतें करते थे आप
या ख़फ़ा हैं हम से वो और हम मना सकते नहीं

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




तलाश इस तरह बज़्म-ए-ऐश में है बे-निशानों की
कोई कपड़े में जैसे ज़ख़्म-ए-सोज़न का निशाँ ढूँढे

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




सुनता हूँ न कानों से न कुछ मुँह से हूँ बकता
ख़ाली है जगह महफ़िल-ए-तस्वीर में मेरी

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




सहरा में 'हवस' ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की मदद से
बारे मिरा ख़ूँ हर ख़स-ओ-ख़ाशाक को पहुँचा

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




सद-चाक किया पैरहन-ए-गुल को सबा ने
जब वो न तिरी ख़ूबी-ए-पोशाक को पहुँचा

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




सब हम-सफ़ीर छोड़ के तन्हा चले गए
कुंज-ए-क़फ़स में मुझ को गिरफ़्तार देख कर

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




रंग-ए-गुल-ए-शगुफ़्ता हूँ आब-ए-रुख़-ए-चमन हूँ मैं
शम-ए-हरम चराग़-ए-दैर क़श्क़ा-ए-बरहमन हूँ मैं

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस