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मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही शायरी | शाही शायरी

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही शेर

34 शेर

ख़याल उस सफ़-ए-मिज़्गाँ का दिल में आएगा
हमारे मुल्क में भरती सिपाह की होगी

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




तारिक-ए-दुनिया है जब से 'मुंतही'
मिस्ल-ए-बेवा मादर-ए-अय्याम है

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




तेरे बाज़ार-ए-दहर में गर्दूं
हम भी आए हैं इक क़बा के लिए

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




तोहमत-ए-जुर्म-ओ-ख़ता हिर्स-ओ-हवा ग़फ़लत-ए-दिल
हम ने बाज़ार से हस्ती के लिया क्या क्या कुछ

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




तुफ़ैल-ए-रूह मिरा जिस्म-ए-ज़ार बाक़ी है
हुआ के दम से ये मुश्त-ए-ग़ुबार बाक़ी है

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




उमीद है हमें फ़र्दा हो या पस-ए-फ़र्दा
ज़रूर होएगी सोहबत वो यार बाक़ी है

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




उस बुत को छोड़ कर हरम-ओ-दैर पर मिटे
अक़्ल-ए-शरीफ़ से ये निहायत बईद है

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




यूँ इंतिज़ार-ए-यार में हम उम्र भर रहे
जैसे नज़र ग़रीब की अल्लाह पर रहे

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही




हो जाती है हवा क़फ़स-ए-तन से छट के रूह
क्या सैद भागता है रिहा हो के दाम से

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही