सूनी गई में हुई यार से मुढभेड़ आज
पूछो कोई किस लिए मुँह पे कर ओझल गया
मिर्ज़ा अज़फ़री
किस ज़माने की ये दुश्मन थी मिरी
इस मोहब्बत का हो मुँह काला मियाँ
मिर्ज़ा अज़फ़री
ओ अतारिद ज़ुहल-ए-नहिस से टुक माँग मिदाद
बख़्त का माजरा लिखता हूँ सियाही देना
मिर्ज़ा अज़फ़री
ओसों गई है प्यास कहीं दीदा-ए-नमीं
बुझता है आँसुओं से कहाँ दिल फुंका हुआ
मिर्ज़ा अज़फ़री
क़सम मय की मुझ बिन है मेरे लहू की
जो हम बिन पियो तो हमारा लहू है
मिर्ज़ा अज़फ़री
रफ़ू जेब-ए-मजनूँ हुआ कब ऐ नासेह
तू मर जाएगा उस के सीते ही सीते
मिर्ज़ा अज़फ़री
शिताबी अपने दीवाने को कर बंद
मुसलसल ज़ुल्फ़ से कर या नज़र-बंद
मिर्ज़ा अज़फ़री
वो उठा कर यक क़दम आया न गाह
हम क़लम साँ उस के, सर के भल गए
मिर्ज़ा अज़फ़री
ज़िंदगी चुभ रही है काँटा सी
गर ये निकले तो सब ख़लल जावे
मिर्ज़ा अज़फ़री

