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ख़ुर्शीद तलब शायरी | शाही शायरी

ख़ुर्शीद तलब शेर

21 शेर

सब ने देखा और सब ख़ामोश थे
एक सूफ़ी का मज़ार उड़ता हुआ

ख़ुर्शीद तलब




कि हम बने ही न थे एक दूसरे के लिए
अब इस यक़ीन को जीना हयात करते हुए

ख़ुर्शीद तलब




कोई चराग़ जलाता नहीं सलीक़े से
मगर सभी को शिकायत हवा से होती है

ख़ुर्शीद तलब




मिरी मुश्किल मिरी मुश्किल नहीं है
वसीला तेरी आसानी का मैं हूँ

ख़ुर्शीद तलब




रोज़ दीवार में चुन देता हूँ मैं अपनी अना
रोज़ वो तोड़ के दीवार निकल आती है

ख़ुर्शीद तलब




सब एक धुँद लिए फिर रहे हैं आँखों में
किसी के चेहरे पे माज़ी न हाल देखता हूँ

ख़ुर्शीद तलब




उस ने आ कर हाथ माथे पर रखा
और मिनटों में बुख़ार उड़ता हुआ

ख़ुर्शीद तलब




ज़िंदगी में जो तुम्हें ख़ुद से ज़ियादा थे अज़ीज़
उन से मिलने क्या कभी जाते हो क़ब्रिस्तान भी

ख़ुर्शीद तलब




ज़मीनें तंग हुई जा रही हैं दिल की तरह
हम अब मकान नहीं मक़बरा बनाते हैं

ख़ुर्शीद तलब