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कैफ़ी आज़मी शायरी | शाही शायरी

कैफ़ी आज़मी शेर

18 शेर

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

कैफ़ी आज़मी




रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं

कैफ़ी आज़मी




रहें न रिंद ये वाइज़ के बस की बात नहीं
तमाम शहर है दो चार दस की बात नहीं

कैफ़ी आज़मी




पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

कैफ़ी आज़मी




मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

कैफ़ी आज़मी




मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई

कैफ़ी आज़मी




कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

कैफ़ी आज़मी




जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

कैफ़ी आज़मी




जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

कैफ़ी आज़मी