मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन
मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है
जावेद अख़्तर
सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
हर घर में बस एक ही कमरा कम है
जावेद अख़्तर
फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है
फिर ख़यालात ने ली अंगड़ाई
जावेद अख़्तर
नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो
हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग
जावेद अख़्तर
मुझे मायूस भी करती नहीं है
यही आदत तिरी अच्छी नहीं है
जावेद अख़्तर
मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था
मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी
जावेद अख़्तर
ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के
वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है
जावेद अख़्तर
कोई शिकवा न ग़म न कोई याद
बैठे बैठे बस आँख भर आई
जावेद अख़्तर

