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इक़बाल साजिद शायरी | शाही शायरी

इक़बाल साजिद शेर

35 शेर

मुसलसल जागने के बाद ख़्वाहिश रूठ जाती है
चलन सीखा है बच्चे की तरह उस ने मचलने का

इक़बाल साजिद




प्यासो रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े

इक़बाल साजिद




प्यार करने भी न पाया था कि रुस्वाई मिली
जुर्म से पहले ही मुझ को संग-ए-ख़म्याज़ा लगा

इक़बाल साजिद




पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ
अब के बरस भी इस के सिवा कुछ नहीं किया

इक़बाल साजिद




पढ़ते पढ़ते थक गए सब लोग तहरीरें मिरी
लिखते लिखते शहर की दीवार काली हो गई

इक़बाल साजिद




मोम की सीढ़ी पे चढ़ कर छू रहे थे आफ़्ताब
फूल से चेहरों को ये कोशिश बहुत महँगी पड़ी

इक़बाल साजिद




मिरे ही हर्फ़ दिखाते थे मेरी शक्ल मुझे
ये इश्तिहार मिरे रू-ब-रू भी होना था

इक़बाल साजिद




रोए हुए भी उन को कई साल हो गए
आँखों में आँसुओं की नुमाइश नहीं हुई

इक़बाल साजिद




मुझ पे पत्थर फेंकने वालों को तेरे शहर में
नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ भी देते हैं पत्थर तोड़ कर

इक़बाल साजिद