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इक़बाल साजिद शायरी | शाही शायरी

इक़बाल साजिद शेर

35 शेर

मिरे घर से ज़ियादा दूर सहरा भी नहीं लेकिन
उदासी नाम ही लेती नहीं बाहर निकलने का

इक़बाल साजिद




'साजिद' तू फिर से ख़ाना-ए-दिल में तलाश कर
मुमकिन है कोई याद पुरानी निकल पड़े

इक़बाल साजिद




सज़ा तो मिलना थी मुझ को बरहना लफ़्ज़ों की
ज़बाँ के साथ लबों को रफ़ू भी होना था

इक़बाल साजिद




सूरज हूँ चमकने का भी हक़ चाहिए मुझ को
मैं कोहर में लिपटा हूँ शफ़क़ चाहिए मुझ को

इक़बाल साजिद




सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा

इक़बाल साजिद




उस ने भी कई रोज़ से ख़्वाहिश नहीं ओढ़ी
मैं ने भी कई दिन से इरादा नहीं पहना

इक़बाल साजिद




वो बोलता था मगर लब नहीं हिलाता था
इशारा करता था जुम्बिश न थी इशारे में

इक़बाल साजिद




वो चाँद है तो अक्स भी पानी में आएगा
किरदार ख़ुद उभर के कहानी में आएगा

इक़बाल साजिद




ये तिरे अशआर तेरी मानवी औलाद हैं
अपने बच्चे बेचना 'इक़बाल-साजिद' छोड़ दे

इक़बाल साजिद