सूरज के उजाले में चराग़ाँ नहीं मुमकिन
सूरज को बुझा दो कि ज़मीं जश्न मनाए
हिमायत अली शाएर
मैं सोचता हूँ इस लिए शायद मैं ज़िंदा हूँ
मुमकिन है ये गुमान हक़ीक़त का ज्ञान दे
हिमायत अली शाएर
फिर मिरी आस बढ़ा कर मुझे मायूस न कर
हासिल-ए-ग़म को ख़ुदा-रा ग़म-ए-हासिल न बना
हिमायत अली शाएर
रौशनी में अपनी शख़्सियत पे जब भी सोचना
अपने क़द को अपने साए से भी कम-तर देखना
हिमायत अली शाएर
'शाइर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप
ठोकरें खा कर तो सुनते हैं सँभल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
शम्अ के मानिंद अहल-ए-अंजुमन से बे-नियाज़
अक्सर अपनी आग में चुप चाप जल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते
कुछ ग़म-ए-मोहब्बत हो कुछ ग़म-ए-जहाँ यारो
हिमायत अली शाएर
तुझ से वफ़ा न की तो किसी से वफ़ा न की
किस तरह इंतिक़ाम लिया अपने आप से
हिमायत अली शाएर
ज़िंदगी की बात सुन कर क्या कहें
इक तमन्ना थी तक़ाज़ा बन गई
हिमायत अली शाएर

