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हक़ीर शायरी | शाही शायरी

हक़ीर शेर

22 शेर

साक़िया ऐसा पिला दे मय का मुझ को जाम तल्ख़
ज़िंदगी दुश्वार हो और हो मुझे आराम तल्ख़

हक़ीर




ख़ूब मिल कर गले से रो लेना
इस से दिल की सफ़ाई होती है

हक़ीर




की किसी पर न जफ़ा मेरे बा'द
ख़ूब रोए वो सुना मेरे बा'द

हक़ीर




क्या जानें उन की चाल में एजाज़ है कि सेहर
वो भी उन्हीं से मिल गए जो थे हमारे लोग

हक़ीर




क्यूँ न का'बे को कहूँ अल्लाह का और बुत का घर
वो भी मेरे दिल में है और ये भी मेरे दिल में है

हक़ीर




मुझे अब मौत बेहतर ज़िंदगी से
वो की तुम ने सितमगारी कि तौबा

हक़ीर




टूटें वो सर जिस में तेरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं
फूटें वो आँखें कि जिन को दीद का लपका नहीं

हक़ीर




यक-ब-यक तर्क न करना था मोहब्बत मुझ से
ख़ैर जिस तरह से आता था वो आता जाता

हक़ीर




या उस से जवाब-ए-ख़त लाना या क़ासिद इतना कह देना
बचने का नहीं बीमार तिरा इरशाद अगर कुछ भी न हुआ

हक़ीर