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हफ़ीज़ जालंधरी शायरी | शाही शायरी

हफ़ीज़ जालंधरी शेर

79 शेर

ना-कामी-ए-इश्क़ या कामयाबी
दोनों का हासिल ख़ाना-ख़राबी

हफ़ीज़ जालंधरी




मोहब्बत करो और निबाहो तो पूछूँ
ये दुश्वारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं

हफ़ीज़ जालंधरी




मुझ को न सुना ख़िज़्र ओ सिकंदर के फ़साने
मेरे लिए यकसाँ है फ़ना हो कि बक़ा हो

हफ़ीज़ जालंधरी




मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा

हफ़ीज़ जालंधरी




मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है
सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ

हफ़ीज़ जालंधरी




नासेह को बुलाओ मिरा ईमान सँभाले
फिर देख लिया उस ने उसी एक नज़र से

हफ़ीज़ जालंधरी




ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा
अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा

हफ़ीज़ जालंधरी




नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल
तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा

हफ़ीज़ जालंधरी




मिरी मजबूरियाँ क्या पूछते हो
कि जीने के लिए मजबूर हूँ मैं

हफ़ीज़ जालंधरी