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ग़ुलाम मौला क़लक़ शायरी | शाही शायरी

ग़ुलाम मौला क़लक़ शेर

49 शेर

तेरा दीवाना तो वहशत की भी हद से निकला
कि बयाबाँ को भी चाहे है बयाबाँ होना

ग़ुलाम मौला क़लक़




नाला करता हूँ लोग सुनते हैं
आप से मेरा कुछ कलाम नहीं

ग़ुलाम मौला क़लक़




न ये है न वो है न मैं हूँ न तू है
हज़ारों तसव्वुर और इक आरज़ू है

ग़ुलाम मौला क़लक़




न लगती आँख तो सोने में क्या बुराई थी
ख़बर कुछ आप की होती तो बे-ख़बर होता

ग़ुलाम मौला क़लक़




न हो आरज़ू कुछ यही आरज़ू है
फ़क़त मैं ही मैं हूँ तो फिर तू ही तू है

ग़ुलाम मौला क़लक़




मूसा के सर पे पाँव है अहल-ए-निगाह का
उस की गली में ख़ाक अड़ी कोह-ए-तूर की

ग़ुलाम मौला क़लक़




मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
जो हो सकता है वो भी आदमी से हो नहीं सकता

ग़ुलाम मौला क़लक़




मैं राज़दाँ हूँ ये कि जहाँ था वहाँ न था
तू बद-गुमाँ है वो कि जहाँ है वहाँ नहीं

ग़ुलाम मौला क़लक़




क्यूँकर न आस्तीं में छुपा कर पढ़ें नमाज़
हक़ तो है ये अज़ीज़ हैं बुत ही ख़ुदा के बा'द

ग़ुलाम मौला क़लक़