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फ़ना निज़ामी कानपुरी शायरी | शाही शायरी

फ़ना निज़ामी कानपुरी शेर

35 शेर

रहता है वहाँ ज़िक्र-ए-तुहूर-ओ-मय-ए-कौसर
हम आज से काबे को भी मय-ख़ाना कहेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी




सहता रहा जफ़ा-ए-दोस्त कहता रहा अदा-ए-दोस्त
मेरे ख़ुलूस ने मिरा जीना मुहाल कर दिया

फ़ना निज़ामी कानपुरी




सब होंगे उस से अपने तआरुफ़ की फ़िक्र में
मुझ को मिरे सुकूत से पहचान जाएगा

फ़ना निज़ामी कानपुरी




साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर
अफ़्सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते

to a drowning person, they on the shores who stand
do lend their sympathy, but not a helping hand

फ़ना निज़ामी कानपुरी




रिंद जन्नत में जा भी चुके
वाइज़-ए-मोहतरम रह गए

फ़ना निज़ामी कानपुरी




मौजों के इत्तिहाद का आलम न पूछिए
क़तरा उठा और उठ के समुंदर उठा लिया

फ़ना निज़ामी कानपुरी




मैं उस के सामने से गुज़रता हूँ इस लिए
तर्क-ए-तअल्लुक़ात का एहसास मर न जाए

it is for this reason, I often pass her by
the pain of our breaking up, may not ever die

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तर्क-ए-तअल्लुक़ात को इक लम्हा चाहिए
लेकिन तमाम उम्र मुझे सोचना पड़ा

फ़ना निज़ामी कानपुरी




क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात भी क्या चीज़ है 'फ़ना'
राह-ए-फ़रार मिल न सकी उम्र-भर फिरे

फ़ना निज़ामी कानपुरी