तुम बिन चाँद न देख सका टूट गई उम्मीद
बिन दर्पन बिन नैन के कैसे मनाएँ ईद
बेकल उत्साही
किवाड़ बंद करो तीरा-बख़्तो सो जाओ
गली में यूँ ही उजालों की आहटें होंगी
बेकल उत्साही
लोग तो जा के समुंदर को जला आए हैं
मैं जिसे फूँक कर आया वो मिरा घर निकला
बेकल उत्साही
न जाने कौन सा नश्शा है उन पे छाया हुआ
क़दम कहीं पे हैं पड़ते कहीं पे चलते हैं
बेकल उत्साही
नश्तर चाहे फूल से बर्फ़ से माँगे ख़ून
धूप खिलाए चाँद को अंधे का क़ानून
बेकल उत्साही
पैसे की बौछार में लोग रहे हमदर्द
बीत गई बरसात जब मौसम हो गया सर्द
बेकल उत्साही
ट्रेन चली तो चल पड़े खेतों के सब झाड़
भाग रहे हैं साथ ही जंगल और पहाड़
बेकल उत्साही
यूँ तो कई किताबें पढ़ीं ज़ेहन में मगर
महफ़ूज़ एक सादा वरक़ देर तक रहा
बेकल उत्साही
वो थे जवाब के साहिल पे मुंतज़िर लेकिन
समय की नाव में मेरा सवाल डूब गया
बेकल उत्साही

