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बकुल देव शायरी | शाही शायरी

बकुल देव शेर

20 शेर

शाम उतरी है फिर अहाते में
जिस्म पर रौशनी के घाव लिए

बकुल देव




मिले अब के तो रोए टूट कर हम
गुनाह अपनी सज़ा के रू-ब-रू था

बकुल देव




मुस्कुराने का फ़न तो बअ'द का है
पहले साअ'त का इंतिख़ाब करो

बकुल देव




सम्त दुनिया के हम गए ही नहीं
उस इलाक़े से दुश्मनी सी रही

बकुल देव




समुंदर है कोई आँखों में शायद
किनारों पर चमकते हैं गुहर से

बकुल देव




उतर जाता तो रुस्वाई बहुत होती
कि सर का बोझ भी दस्तार जैसा था

बकुल देव




ज़ेर-ए-लब रख छुपा के नाम उस का
लफ़्ज़ होते हैं कुछ बयाँ से ख़राब

बकुल देव




वही आँसू वही माज़ी के क़िस्से
जिसे देखो कटे को काटता है

बकुल देव




मैं सारे फ़ासले तय कर चुका हूँ
ख़ुदी जो दरमियाँ थी दरमियाँ है

बकुल देव