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आज़ाद गुलाटी शायरी | शाही शायरी

आज़ाद गुलाटी शेर

25 शेर

समेट लो मुझे अपनी सदा के हल्क़ों में
मैं ख़ामुशी की हवा से बिखरने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी




समेट लाता हूँ मोती तुम्हारी यादों के
जो ख़ल्वतों के समुंदर में डूबता हूँ मैं

आज़ाद गुलाटी




साल-ए-नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं
कुछ पुराने से कैलन्डर ज़ेहन की दीवार पर

आज़ाद गुलाटी




रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
कुछ दिए ऐसे जले हर-सू अंधेरा हो गया

आज़ाद गुलाटी




आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया
एक मुद्दत हो गई जिस शख़्स को देखे हुए

आज़ाद गुलाटी




मैं साथ ले के चलूँगा तुम्हें ऐ हम-सफ़रो
मैं तुम से आगे हूँ लेकिन ठहरने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी




कुछ ऐसे फूल भी गुज़रे हैं मेरी नज़रों से
जो खिल के भी न समझ पाए ज़िंदगी क्या है

आज़ाद गुलाटी




किसे मिलती नजात 'आज़ाद' हस्ती के मसाइल से
कि हर कोई मुक़य्यद आब ओ गिल के सिलसिलों का था

आज़ाद गुलाटी




किस से पूछें रात-भर अपने भटकने का सबब
सब यहाँ मिलते हैं जैसे नींद में जागे हुए

आज़ाद गुलाटी