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अब्दुल अहद साज़ शायरी | शाही शायरी

अब्दुल अहद साज़ शेर

36 शेर

नज़र की मौत इक ताज़ा अलमिया
और इतने में नज़ारा मर रहा है

अब्दुल अहद साज़




प्यास बुझ जाए ज़मीं सब्ज़ हो मंज़र धुल जाए
काम क्या क्या न इन आँखों की तिरी आए हमें

अब्दुल अहद साज़




पस-मंज़र में 'फ़ीड' हुए जाते हैं इंसानी किरदार
फ़ोकस में रफ़्ता रफ़्ता शैतान उभरता आता है

अब्दुल अहद साज़




नींद मिट्टी की महक सब्ज़े की ठंडक
मुझ को अपना घर बहुत याद आ रहा है

अब्दुल अहद साज़




नेक गुज़रे मिरी शब सिद्क़-ए-बदन से तेरे
ग़म नहीं राब्ता-ए-सुब्ह जो काज़िब ठहरे

अब्दुल अहद साज़




मुफ़्लिसी भूक को शहवत से मिला देती है
गंदुमी लम्स में है ज़ाइक़ा-ए-नान-ए-जवीं

अब्दुल अहद साज़




मिरी रफ़ीक़-ए-नफ़्स मौत तेरी उम्र दराज़
कि ज़िंदगी की तमन्ना है दिल में अफ़्ज़ूँ फिर

अब्दुल अहद साज़




रात है लोग घर में बैठे हैं
दफ़्तर-आलूदा ओ दुकान-ज़दा

अब्दुल अहद साज़




मुशाबहत के ये धोके मुमासलत के फ़रेब
मिरा तज़ाद लिए मुझ सा हू-ब-हू क्या है

अब्दुल अहद साज़