मिरे मह ओ साल की कहानी की दूसरी क़िस्त इस तरह है
जुनूँ ने रुस्वाइयाँ लिखी थीं ख़िरद ने तन्हाइयाँ लिखी हैं
अब्दुल अहद साज़
'साज़' जब खुला हम पर शेर कोई 'ग़ालिब' का
हम ने गोया बातिन का इक सुराग़ सा पाया
अब्दुल अहद साज़
शायरी तलब अपनी शायरी अता उस की
हौसले से कम माँगा ज़र्फ़ से सिवा पाया
अब्दुल अहद साज़
शेर अच्छे भी कहो सच भी कहो कम भी कहो
दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुस्वा न करो
अब्दुल अहद साज़
शिकस्त-ए-व'अदा की महफ़िल अजीब थी तेरी
मिरा न होना था बरपा तिरे न आने में
अब्दुल अहद साज़
शोलों से बे-कार डराते हो हम को
गुज़रे हैं हम सर्द जहन्नम-ज़ारों से
अब्दुल अहद साज़
वो तो ऐसा भी है वैसा भी है कैसा है मगर?
क्या ग़ज़ब है कोई उस शोख़ के जैसा भी नहीं
अब्दुल अहद साज़
यादों के नक़्श घुल गए तेज़ाब-ए-वक़्त में
चेहरों के नाम दिल की ख़लाओं में खो गए
अब्दुल अहद साज़
ज़माने सब्ज़ ओ सुर्ख़ ओ ज़र्द गुज़रे
ज़मीं लेकिन वही ख़ाकिस्तरी है
अब्दुल अहद साज़

