भरोसा भरोसा
ये क्या रट लगाई है तुम ने?
तुम अलग हो कोई इस जहाँ से
अरे
जैसा मैं वैसे तुम
मैं ही जब आज की सुब्ह वैसा न था जैसा सोया था रात
तो फिर किस लिए और क्यूँ
मैं तुम्हारी पुरानी वफ़ा-दारियों पर भरोसा करूँ
ये बताओ
नज़्म
यक़ीन के ख़िलाफ़
शारिक़ कैफ़ी

