EN اردو
ला-ज़वाल होने का | शाही शायरी
la-zawal hone ka

नज़्म

ला-ज़वाल होने का

शहरयार

;

रात की खुली खिड़की
बंद होने वाली है

चाँद के कटोरे में
ओस भरने वाली है

ये अजब सफ़र इस का
अब तमाम होता है

ला-ज़वाल होने का
देखो क्या बहाना है

कल भी इक हक़ीक़त था
आज भी फ़साना है

आसमान की जानिब
सब के हाथ उठते हैं

उस के ख़ून की सुर्ख़ी
बर्ग-ओ-बार लाएगी

बे-नमाज़ बंदों पर
यानी उन दरिंदों पर

हर क़दम मसाइब का
इंतिज़ार लाएगा