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Garmi शायरी | शाही शायरी

Garmi

19 शेर

फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है
बाहर कितना सन्नाटा है अंदर कितनी वहशत है

ऐतबार साजिद




पड़ जाएँ मिरे जिस्म पे लाख आबले 'अकबर'
पढ़ कर जो कोई फूँक दे अप्रैल मई जून

अकबर इलाहाबादी




धूप की गरमी से ईंटें पक गईं फल पक गए
इक हमारा जिस्म था अख़्तर जो कच्चा रह गया

अख़्तर होशियारपुरी




गर्मी लगी तो ख़ुद से अलग हो के सो गए
सर्दी लगी तो ख़ुद को दोबारा पहन लिया

बेदिल हैदरी




दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

हसरत मोहानी




गर्मी ने कुछ आग और भी सीने में लगाई
हर तौर ग़रज़ आप से मिलना ही कम अच्छा

इंशा अल्लाह ख़ान




पिघलते देख के सूरज की गर्मी
अभी मासूम किरनें रो गई हैं

जालिब नोमानी