EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

काबा ओ दैर जिधर देखा उधर कसरत है
आह क्या जाने किधर गोशा-ए-तन्हाई है

रज़ा अज़ीमाबादी




काबे में शैख़ मुझ को समझे ज़लील लेकिन
सौ शुक्र मय-कदे में है ए'तिबार अपना

रज़ा अज़ीमाबादी




काबे में शैख़ मुझ को समझे ज़लील लेकिन
सौ शुक्र मय-कदे में है ए'तिबार अपना

रज़ा अज़ीमाबादी




ख़ुशा हो कर बुताँ कब आशिक़ों को याद करते हैं
'रज़ा' हैराँ हूँ मैं किस बात पर है उतना भोला तू

रज़ा अज़ीमाबादी




ख़्वाह काफ़िर मुझे कह ख़्वाह मुसलमान ऐ शैख़
बुत के हाथों में बिका या हूँ ख़ुदा की सौगंद

रज़ा अज़ीमाबादी




किस तरह 'रज़ा' तू न हो धवाने ज़माना
जब दिल सा तिरी बैठा हो बदनाम बग़ल में

रज़ा अज़ीमाबादी




क्या कहें अपनी सियह-बख़्ती ही का अंधेर है
वर्ना सब की हिज्र की रात ऐसी काली भी नहीं

रज़ा अज़ीमाबादी