शेर पढ़ते हुए ये तुम ने कभी सोचा है
शेर कहते हुए मैं कितनी दफ़ा मरता हूँ
त्रिपुरारि
मोहब्बत में शिकायत कर रहा हूँ
शिकायत में मोहब्बत कर रहा हूँ
त्रिपुरारि
नींद आए तो कुछ सुराग़ मिले
कौन है दफ़्न मेरे ख़्वाबों में
त्रिपुरारि
प्यास ऐसी थी कि मैं सारा समुंदर पी गया
पर मिरे होंटों के ये दोनों किनारे जल गए
त्रिपुरारि
क़त्ल करना है नए ख़्वाब का सो डरता हूँ
काँप जाएँ न मिरे हाथ ये ख़ूँ करते हुए
त्रिपुरारि
रूह है तर्जुमा पानियों का अगर
जिस्म या'नी समुंदर में इक नाव है
त्रिपुरारि
तुम मिरे पास न आओ कि यही बेहतर है
पास आने से तो पहचान भी जा सकती है
त्रिपुरारि
ये बारिश कब रुकेगी कौन जाने
कहीं मैं मर न जाऊँ तिश्नगी से
त्रिपुरारि
उम्र भर लड़ता रहा हूँ उस से
वो जो इक शख़्स कभी था ही नहीं
त्रिपुरारि

