EN اردو
शौकत परदेसी शायरी | शाही शायरी

शौकत परदेसी शेर

34 शेर

ना-शनासान-ए-मुहब्बत का गिला क्या कि यहाँ
अजनबी वो हैं कि थी जिन से शनासाई भी

शौकत परदेसी




रात इक नादार का घर जल गया था और बस
लोग तो बे-वज्ह सन्नाटे से घबराने लगे

शौकत परदेसी




क़रीब से उसे देखो तो वो भी तन्हा है
जो दूर से नज़र आता है अंजुमन यारो

शौकत परदेसी




फूँक कर सारा चमन जब वो शरीक-ए-ग़म हुए
उन को इस आलम में भी ग़म-आश्ना कहना पड़ा

शौकत परदेसी




निगाह को भी मयस्सर है दिल की गहराई
ये तर्जुमान-ए-मोहब्बत है बे-ज़बाँ न कहो

शौकत परदेसी




क्या बढ़ेगा वो तसव्वुर की हदों से आगे
सुब्ह की देख के याद आए जिसे शाम की बात

शौकत परदेसी




कुछ तो फ़ितरत से मिली दानाई
कुछ मयस्सर हुई नादानों से

शौकत परदेसी




शरीक-ए-दर्द नहीं जब कोई तो ऐ 'शौकत'
ख़ुद अपनी ज़ात की बेचारगी ग़नीमत है

शौकत परदेसी




मौज-ए-तूफ़ाँ से निकल कर भी सलामत न रहे
नज़्र-ए-साहिल हुए दरिया के शनावर कितने

शौकत परदेसी