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शाहिद मीर शायरी | शाही शायरी

शाहिद मीर शेर

18 शेर

रास आई कुछ इस तरह शब्दों की जागीर
'शाहिद' पीछे रह गए आगे बढ़ गए 'मीर'

शाहिद मीर




ज़ेहन में तू आँखों में तू दिल में तिरा वजूद
मेरा तो बस नाम है हर जा तू मौजूद

शाहिद मीर




वही सफ़्फ़ाक हवाओं का सदफ़ बनते हैं
जिन दरख़्तों का निकलता हवा क़द होता है

शाहिद मीर




तुझ को देखा नहीं महसूस किया है मैं ने
आ किसी दिन मिरे एहसास को पैकर कर दे

शाहिद मीर




तातीलें रुख़्सत हुईं खुले सभी स्कूल
सड़कों पर खिलने लगे प्यारे प्यारे फूल

शाहिद मीर




शजर ने लहलहा कर और हवा ने चूम कर मुझ को
तिरी आमद के अफ़्साने सुनाए झूम कर मुझ को

शाहिद मीर




शब गुज़री बुझने लगा रौशनियों का शहर
लौटी साहिल की तरफ़ थकी थकी इक लहर

शाहिद मीर




'शाहिद' लिखना है मुझे ये किस की तारीफ़
डरा डरा सा क़ाफ़िया सहमी हुई रदीफ़

शाहिद मीर




रोने से और लुत्फ़ वफ़ाओं का बढ़ गया
सब ज़ाइक़ा फलों में नए पानियों का है

शाहिद मीर