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सरवत हुसैन शायरी | शाही शायरी

सरवत हुसैन शेर

33 शेर

क़िन्दील-ए-मह-ओ-मेहर का अफ़्लाक पे होना
कुछ इस से ज़ियादा है मिरा ख़ाक पे होना

सरवत हुसैन




सोचता हूँ दयार-ए-बे-परवा
क्यूँ मिरा एहतिराम करने लगा

सरवत हुसैन




सियाही फेरती जाती हैं रातें बहर ओ बर पे
इन्ही तारीकियों से मुझ को भी हिस्सा मिलेगा

सरवत हुसैन




शहज़ादी तुझे कौन बताए तेरे चराग़-कदे तक
कितनी मेहराबें पड़ती हैं कितने दर आते हैं

सरवत हुसैन




'सरवत' तुम अपने लोगों से यूँ मिलते हो
जैसे उन लोगों से मिलना फिर नहीं होगा

सरवत हुसैन




नई नई सी आग है या फिर कौन है वो
पीले फूलों गहरे सुर्ख़ लिबादों वाली

सरवत हुसैन




मिरे सीने में दिल है या कोई शहज़ादा-ए-ख़ुद-सर
किसी दिन उस को ताज-ओ-तख़्त से महरूम कर देखूँ

सरवत हुसैन




सोचता हूँ कि उस से बच निकलूँ
बच निकलने के ब'अद क्या होगा

सरवत हुसैन




पाँव साकित हो गए 'सरवत' किसी को देख कर
इक कशिश महताब जैसी चेहरा-ए-दिलबर में थी

सरवत हुसैन